Friday, November 28, 2014

चलो मेरी वफ़ात का सबब तो बन गयी
जो ता-उम्र जीने की दवा न बन सकी
मै तो रोज़ ही बनता रहा बिखरता रहा
पर ये जिंदगी कभी उसके सिवा न बन सकी 

Thursday, November 27, 2014

उम्रभर का फासला

न कोई शिकवा है,न अब और कोई गिला है
मै तो खुश हू,जो भी मुझे जिंदगी से मिला है  
कुछ दर्द है,अश्क़ है और ये आलम ए तनहाई 
है प्यार जिनसे,उनसे उम्रभर का फासला है 

Wednesday, November 19, 2014

...भिजलेले किनारे

शुन्य मनाला या ओल्या पापण्यांचे सहारे
शुष्क समुद्राचे जसे ते भिजलेले किनारे

असतात चटकेच जेव्हा,नशिबी तुमच्या
ठेवताच पाऊल पेटतात,विझलेले निखारे

वादळातही कधी टिकते उभारी मनाची 
कोसळतात कधी सुखातही हे निवारे 

नको साथ कुणाची,हे आयुष्य सावराया 
असू दे असेच आता,या दुःखाचे पसारे 

उभ्या आहेत सभोवताली,या काचभिंती 
जो तो करतो आहे,का हे नि:शब्द इशारे 

कधी पुढे कधी मागे,होतात या सावल्या 
सूर्य का ठरवत असतो "ठाकुर"या दिशा रे 

किसी की खातिर हम इस कदर,मिटते चले गये
के सागर किनारे अपनी दास्तां लिखते चले
कर के हर इक दर्द,उन बेताब मौजो के हवाले
धीरे धीरे में इस बे-दर्द जिंदगी से,उठते चले गए






Monday, November 17, 2014

हुवा करते है

बारहा नजरो में आता है,जो है दिल में बसा हुवां  
वरना इस जहां में कुछ मंजर और भी हुवा करते है 
कश्ती ऐ दिल क्यों आ जाती है अक्सर तुफानो में 
वैसे तो यहाँ खामोश समंदर और भी हुवा करते है 

Friday, November 14, 2014

...पाते है देखे

हर गाम पे है काटो की बस्ती,कहा तक चल पाते है देखे
इस बे-सहारा जिंदगानी में,कब तक सम्हल पाते है देखे 

वो दूर उफक तक है फैला,हुकूमत-ए-जुल्मत का सितम   
उम्मीद की किरनो के काफिले,कब निकल पाते है देखे  

सुना है हर दर पे सुकू,दस्तक दे ही देता है एक दिन 
पैगाम-ए-मसर्रत अब दिल को,कब मिल पाते है देखे

दर-ए-खुदा हो,ये सनमकदा हो या फिर हो ये मैखाना
मुन्तशिर किस्मत के रास्ते,कहा से बदल पाते है देखे

तेरे साथ ही नहीं चलते है आजकल,तेरे ही साये "ठाकुर"
फासले अब ये अनजाने से, कब पिघल पाते है देखे

गाम-पाऊल
उफ़क़ --क्षितिज
ज़ुल्मत --अंधार
मसर्रत --ख़ुशी
मुंतशिर --विस्कटलेला




Sunday, November 9, 2014

घुटमळलो होतो

ओलांडताना तो उंबरठा,मी अडखळलो होतो 
ठेच लागली मनाला अन हळहळलो होतो 
तिच्या आठवणींच्या पायऱ्या उतरता उतरता 
शेवटचं तिला पाहायला मात्र घुटमळलो होतो 

Tuesday, November 4, 2014

...पुन्हा पुन्हा

माझ्याच सावलीत संगत तुझी,शोधतो पुन्हा पुन्हा 
स्पर्शून तुझ्या जाणीवेला,तुज भेटतो पुन्हा पुन्हा 
माझ्या चेहऱ्यात प्रतिबिंब तुझे,दाखवतो आरसा 
तुझ्यासाठीच स्वतः कड़े मी,पाहतो पुन्हा पुन्हा