Saturday, November 14, 2009

...क्यों नही

क्या करू मैं अब कोई समझाता क्यों नहीहाय!ये दर्द सीने से आख़िर जाता क्यों नही
मिलके इतने सारे पैमाने,दिल बहला न सके
ऐ साकी तू थोडी और मुझे पिलाता क्यों नही
कब से भटक रहा हूं मैं,इस गली से उस गली
मेहमाँ जान के मुझको,कोई घर बुलाता क्यों नहीअँधियारा मायूसी का बढ़के है इन रातो सेकोई आके चराग़ दिल में जलाता क्यों नही
है आरज़ू के झेल जाऊ इक ज़ख्म आखरी
ऐ खुदा तू तीर-ऐ-कज़ा चलाता क्यों नही
कितनी राते बितायी तुने,याद में जिन की 'ठाकुर'
उनको मगर कभी तू याद आता क्यों नही

Tuesday, November 10, 2009

...क्यों होने लगा

तेरा खयाल और ये इज्तराब क्यों होने लगा
छुपाया हुवा वो दर्द बे-नकाब क्यों होने लगा

है इल्म-ऐ-वजूद मुझको आसमाँ के चाँद का
फ़िर ख्वाब में वो रुख माहताब क्यों होने लगा

महफिल में और भी है यहाँ दिल को लुभानेवाले
मेरी नजरो को तेरा इन्तेख्वाब क्यों होने लगा

यु तो अपनी ही धुन में जीते रहे हम आजतक
अपनी हस्ती पे कोई कामयाब क्यों होने लगा

तू लाख करे इन्कार इस छुपी उल्फत का 'ठाकुर'
रातो का आलम फ़िर बेख्वाब क्यों होने लगा

इज्तेराब-बेचैनी,इन्तेख्वाब-चुनाव
बेख्वाबी-नींद न आना

Saturday, November 7, 2009

दूर भी तो नही

नही है जो तू सामने मेरे,मगर दूर भी तो नही
इस दिल को सिवा तेरे,कोई मंजूर भी तो नही

रख के हाथ दिल पे,सोचता हूँ कुछ बहल जाऊ
धडकनों के सिवा और कोई,सुरूर भी तो नही

बिता देंगे जहाँ-ऐ-इश्क में,तमाम उम्र अपनी
जीते जी लौट जाना,यहाँ का दस्तूर भी तो नही

नही थी जो नीयत तेरी,विसाल-ऐ-यार हो जाए
वरना ऐ खुदा तू इस कदर,मजबूर भी तो नही

क्यों ऐसी निगाह से देखता है जमाना तुझको 'ठाकुर'
इश्क में लूट जाना फ़िर तेरा कसूर भी तो नही