Tuesday, April 21, 2015

बेमक़सद ही निकला था घर से 
पर कुछ ले के मै लौट आया हू 
शायद कुछ कमा के आज नहीं लाया 
पर एक तजुर्बा अपने साथ लाया हूं 
तौहीन अपनों ने की,परायो ने साथ निभाया 
देखो मै आज अपनों का ही सताया हू 
अब हर गम पे हसने की ठानी है मैंने 
इसलिये आज जी भर के मुस्कुराया हू 


Saturday, April 18, 2015


खुद ही ढूंढता हू तुझको शिद्दत से
और तेरी आहट पे लरज़ जाता हूं
जब  सम्हल नहीं पाता इस उलझन से 
तब अश्क़ बन के बरस जाता हू
फिर भी रहती है जब बाकी,आरज़ू तेरे दीदार की
आ के चुपके से तेरे कूचे में,मै ठहर जाता हू   

लरज़ जाना--कांपना 




खुद ही ढूंढता है कोई तुझको
और तेरी आहट से लरज़ जाता है

Wednesday, April 8, 2015

मेरी कहानी नहीं कहती,मेरे हाथों की लकीरें
देखू गौर से जो इन को,तो तेरा ही ज़िक्र पाता हूँ 
कुछ हाल है ऐसा ही,आजकल मेरी आँखों का
जानिबे-खुदा भी देखू,तो तेरा ही अक्स पाता हूँ 

@ मनिष गोखले... 

Tuesday, April 7, 2015

तुझसे दूरियों का न कभीशिकवा किया मैने
जहा पड़ा तेरा साया,वही सजदा किया मैने
बड़े फ़क्र से वो धूल, सजा के अपने माथे
किस्मत की लकीरों को यू ज़िंदा किया मैंने