Wednesday, July 14, 2010

क्या करे

इमकानात सफ़र के ही जो ना रहे
तो अब इंतजार-ए-हमसफ़र क्या करे
सु-ए-उफक-ए-उम्मीद भी देखे क्यों
डोर सासों की रही मुख़्तसर क्या करे  

इमकानात-शक्यता
उफक-क्षितिज
मुख़्तसर-थोड़ी(Short)

2 comments:

DIVYKARNI SINGH RAJPUROHIT said...

nice i like it

roop said...

good one ,visit me at roop62.blogspot.com