Friday, September 23, 2011

...को भूल जाऊ

ये तो कोई और है के मै तेरी परछाई को भूल जाऊ
तेरे खयाल में ही रहू और इस तनहाई को भूल जाऊ
आयी हो चाहे तब्दीली तेरी नजर में आज फिर भी
तेरी आरजू में ही रहू और इस बेवफाई को भूल जाऊ



Saturday, July 30, 2011

तल्खिया -- एक डर

तल्ख़ जुबा वालो,जरा और तल्ख़ी से काम लो
पता तो चले,के ये जहर और कितना है बाकी
ये हो जाये,तो झांक लेना तुम गिरेबा में अपने
जान लोगे,के तुम में ये डर और कितना है बाकी  


Wednesday, July 27, 2011

...गमगुसार बन के

चले आते है वो अक्सर,बड़े ही गम-गुसार बन के
छुपाके उस शगुफे में दरअसल,वो खार ले आते है
जुबा पे न हो,पर तल्खिया नजर आती है आखो में
जताते है ऐसे,के सारे ज़माने का वो प्यार ले आते है  

Saturday, June 25, 2011

दर्द

न उसने आग लगायी और न लगायी हमने
फिर भी दिल से धुवा अक्सर उठता रहा
वो ही था एक जो बाट सकता था दर्द मेरे
फिर भी दिल में दर्द क्यों कर उठता रहा 

...अब किसको ये खबर है

पीठ पीछे क्या होता है,अब किसको ये खबर है
रहनुमा बन के राह दिखाती,अपनी ये नजर है 

बस कदम है चलते और दिल है कही ठहरा हुवा
इसी खिचा-तानी से वाबस्ता हर एक बशर है 

नफरत के धारो में  है फसी,इंसानियत की कश्ती
डूबा के ही रख देता है एक दिन,ऐसा ये भंवर हैं


जिनको दिये थे  साये और पनाह इस पहलु में दी
उन्ही मुसाफिरों ने तोडा,दिल ऐसा एक शजर है 

अब क्या कहे "ठाकुर" दास्तान ए-गम-ए-जिंदगी
कितनी भी सुनाना चाहे जहाँ को,उतनी मुक्तसर है   


बशर-इंसान,
शजर-पेड़,
मुक्तसर-थोड़ी 

Saturday, June 18, 2011

...बिखरे नहीं है

थाम लो उन लम्हों को,जो यहाँ से अभी गुजरे नहीं है 
दिल दुखे है जरा से लेकिन,टूट के अभी बिखरे नहीं है 
एक मोहब्बत की सदा से,पुकार के देखो तो जरा तुम 
जख्म भर जायेंगे शायद,वो इतने अभी गहरे नहीं है 

Wednesday, June 15, 2011

...करते रहे

ख़ुशी से मुह मोड़ा और गम का यु ही इन्तेजार करते रहे
नश्तर से रंजिशे नहीं की,और जख्मों से प्यार करते रहे 
अश्क जो आये लबो तक,समझा आब-ए-हयात उनको 
नशे में जीते रहे इस तरह और मौत को बेजार करते रहे