Monday, March 28, 2011

पहले भी कुछ....

पहले भी कुछ मिलता था तुमसे,आज भी कुछ मिलता है
फर्क इतना ही है के मोहब्बत की जगह झिझक ने ली है
पहले भी ढूंढता था मै अक्सर,तुझ को तुझ ही में लेकिन
इस दायरे की जगह अब शायद,फैले हुवे उफक ने ली है

उफक--क्षितिज

Friday, March 25, 2011

फिर से एक बार

वो जख्म भरेंगे कैसे,अगर बार बार छेड़े जाये
दिल क्यों न दुखेंगे,अगर बार बार तोड़े जाये
मोहब्बत करनेवाले तुमसे,यही चाहेंगे फिर भी
वो ठहरे हुवे रिश्ते,फिर से एक बार जोड़े जाये

Saturday, February 12, 2011

डोर-ए-जीस्त

ऐ दिल तू कोशिश ना कर,अब कोई दर्द मिटाने की  
आग में जल जा,पर आरजू ना कर इसे बुझाने की
कुछ सुनेगा तेरी,ऐसा कौन है अब इस दुनिया में
बस राह देख तू अब,ये डोर-ए-जीस्त टूट जाने की

जीस्त-जिंदगी

Tuesday, January 18, 2011

और कही देखा ही नहीं

उनसे पहले दिल अपना इस तरह कही लगा ही नहीं
देखा जो एक बार उनको फिर और कही देखा ही नहीं

वो तसव्वुर वो अहसास वो बेखुदी आये है जिंदगी में
कैसे कहूँ मेरी खातिर यह जमाना अब बदला ही नहीं

संग-ए-दर-ए-यार से वाबस्ता अपने सजदे हो गये है
मैं तो उठा मुरव्वत से,मगर दिल मेरा उठा ही नहीं

उनकी उल्फत में ता-आसमाँ पोह्ची है ख्वाहिशे अपनी
जमी पे जैसे कदमो को हमने कभी रखा ही नहीं

लाख छुपाये रखा तुमने"ठाकुर" तस्वीर-ए-हुस्न-ए-यार को  
शीशा-ए-दिल से मगर अक्स उनका कभी छुपा ही नहीं  

शजर

नफरत की आग में क्यों किसी का घर जलाये बैठे हो
क्या है खबर तुम्हे किसी का मुक़द्दर जलाये बैठे हो
जिंदगी की धुप में तुम कोई साया अब पाओगे कैसे 
खुद ही अपने ताल्लुक का तुम  शजर जलाये बैठे हो

शजर...पेड़/Tree

Monday, January 17, 2011

कमजर्फी

अपनीही मस्ती में चूर,लोगो की कमज़र्फी क्या कहे
गम-ए-गैर पे हसने वाले,ज़माने की हमदर्दी क्या कहे
मतलब की खातिर दर-ए-हरम पे, अपना सर झुकानेवाले
इंसा तो क्या,खुदा से भी इनकी,खुदगर्ज़ी क्या कहे  

कमज़र्फ --कोत्या मनाचा 

Tuesday, December 14, 2010

मयस्सर

हम भी हस लेते,गर ना रूठा अपना मुक़द्दर होता
दो पल गुजारना चैन के,हम को भी मयस्सर होता
शम्स-ए-मसर्रत ने आजकल,मुह फेरा है हम से वर्ना 
छोटासा आशियाँ ये अपना भी,कुछ तो मुनव्वर होता  

मयस्सर-मुमकिन/हासिल
मुनव्वर-प्रकाशमान 
मसर्रत-ख़ुशी,सुख