Saturday, September 22, 2007

चाहत

यह तेरी आरजू कोई पल दो पल की बात नही
ढुन्ढ्ता था तुझे जिंदगी से पहले,चाहूँगा तुझे कजा के बाद

Wednesday, August 29, 2007

नूर

ये आलम-ए-निम् शब् और ये नूर कैसा
कही वो बे-पर्दा तो नही हुवे है ?

तबस्सुम

हुस्न लेके आया है तबस्सुम जिंदगी मे
फिर क्यों न जी भर के मुस्कुराऊ मैं

सुर्खी

क्यो उठाती हो सवाल इन आँखो की लाली पर
ये सुर्खी तेरे लबों की कहाँ सोने देती है मुझको

चैन

आज तो सो लू मैं जरा चैन से
सुना है वो जाग रहे है मेरे खयालों मे

अदा

तेरी अदाओं ने सिखाया है इस दिल को धड़कना,
खुदा करे तू यु ही जलवे लुटती रहे मेरे जीने के लिए

सिलसिला

एक जो तुझसे नजर मिली,फिर चलता रहा सिलसिला दर्द का
बुझते बुझते जल उठी है हर बार ये चिंगारिया