तेरे गम के पियाले होठो से लगाऊ कैसे?
शम्मा अपने इश्क की ख़ुद बुझाऊ कैसे?
कितनी हसरत से सजाये थे ख्वाब मैंने
बसाके तुम्हे अपने दिल में भुलाऊ कैसे?
Monday, February 16, 2009
Wednesday, February 11, 2009
मोहब्बत जिंदगी है
याद उनके तबस्सुम आये,तो अश्क बहने लगे
तड़प के इस दिल के जर्रे कुछ और दर्द सहने लगे
भुलाने से भूल जाये ये फलसफा-ऐ-इश्क कहाँ?
नही सिवा उनके ये जिंदगी,दिल के तार कहने लगे
तड़प के इस दिल के जर्रे कुछ और दर्द सहने लगे
भुलाने से भूल जाये ये फलसफा-ऐ-इश्क कहाँ?
नही सिवा उनके ये जिंदगी,दिल के तार कहने लगे
Monday, January 26, 2009
तू है वही
जाने क्यों लगता है मुझे,के तू है वही
तलाश जिसकी मुझको,सदियों से रही
वर्ना और भी है यहाँ दिल लुभाने वाले
जो बात तुझमे है,वो किसी और में नही
तलाश जिसकी मुझको,सदियों से रही
वर्ना और भी है यहाँ दिल लुभाने वाले
जो बात तुझमे है,वो किसी और में नही
Sunday, December 7, 2008
आओ करीब इतने...
आओ करीब इतने,के तेरी जुल्फ बिखर जाये मेरी शानो पर
आओ करीब इतने,के जोर धडकनों का हो दिल के खानों पर
के मेरी साँसों में घुल जाने दो आज अपनी साँसों का शमीम
आओ करीब इतने,के बर्क लहरा जाये इश्क के आसमानों पर
शानो पर -कंधे पर
आओ करीब इतने,के जोर धडकनों का हो दिल के खानों पर
के मेरी साँसों में घुल जाने दो आज अपनी साँसों का शमीम
आओ करीब इतने,के बर्क लहरा जाये इश्क के आसमानों पर
शानो पर -कंधे पर
Thursday, December 4, 2008
तकदीर-ऐ-इश्क
जो न कही अब तक,वो बात उन्हें आज बताऊंगा मैं
कदमो में उनके रख के दिल,किस्मत आजमाऊंगा मैं
गर होंगे कुबूल उनको मेरी बेताब धडकनों के नजराने
तकदीर-ऐ-रोशन पे मेरी फ़िर जी भर के इतराउंगा मैं
कदमो में उनके रख के दिल,किस्मत आजमाऊंगा मैं
गर होंगे कुबूल उनको मेरी बेताब धडकनों के नजराने
तकदीर-ऐ-रोशन पे मेरी फ़िर जी भर के इतराउंगा मैं
Friday, November 14, 2008
चाँद-एक आइना
वो भी देखते है तुम्हे और देखते है हम भी
ऐ चाँद ख़ुद बन जाना तुम आइना कभी
देख तो ले वो के पल पल तडपता है कोई
है आरजू के मेरे हाल से न रहे वो अजनबी
ऐ चाँद ख़ुद बन जाना तुम आइना कभी
देख तो ले वो के पल पल तडपता है कोई
है आरजू के मेरे हाल से न रहे वो अजनबी
Wednesday, November 12, 2008
कोई नही अपना
बे-घर होते चले गए,दिल के आशियाने को सम्हालते सम्हालते
हर आब-ओ-हवा रूठ गई हमसे,इस मौसम के बदलते बदलते
नही और कोई नजारा,अपनी उजड़ी हसरतो के मंजर के सिवा
साये भी अपने हो चुके है पराये,दो कदम मेरे साथ चलते चलते
हर आब-ओ-हवा रूठ गई हमसे,इस मौसम के बदलते बदलते
नही और कोई नजारा,अपनी उजड़ी हसरतो के मंजर के सिवा
साये भी अपने हो चुके है पराये,दो कदम मेरे साथ चलते चलते
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